अब भारतीय मुक्केबाजों का सामना करने से डरते हैं विरोधी

कॉमनवेल्थ गोल्ड मेडलिस्ट प्रीति पवार का बड़ा दावा

नितिन नागर

नई दिल्ली। ग्लास्गो राष्ट्रमंडल खेलों में स्वर्ण पदक जीतने वाली मुक्केबाज प्रीति पवार का मानना है कि भारतीय मुक्केबाजी ने दुनिया में अपनी अलग पहचान बना ली है। एक समय भारत को मजबूत मुक्केबाजी टीम नहीं माना जाता था, लेकिन अब विरोधी भारतीय मुक्केबाजों के विरुद्ध मुकाबला मिलने से बचना चाहते हैं।

जेएसडब्ल्यू समर्थित एथलीट प्रीति की नजरें अब सितम्बर में एशियाई खेलों और उसके बाद लॉस एंजिलिस ओलम्पिक में पदक जीतने पर हैं। राष्ट्रमंडल खेलों की सफलता और भारतीय मुक्केबाजी के भविष्य पर प्रीति पवार ने विस्तार से बातचीत की।

सवाल: ग्लास्गो राष्ट्रमंडल खेलों के स्वर्ण पदक अपने करियर में कहां रखती हैं?

जवाब: यह पदक मेरे लिए बेहद महत्वपूर्ण है। राष्ट्रमंडल खेल बहुत बड़ा मंच है और वहां भारत का प्रतिनिधित्व करते हुए स्वर्ण जीतना मेरे लिए सम्मान की बात है। मेरा लक्ष्य अपना सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन करना और यहां से ऐसी चीजें सीखना था, जो भविष्य में मेरे काम आएं।

सवाल: स्वर्ण जीतने के बाद जब राष्ट्रगान बजा और तिरंगा सबसे ऊपर गया, उस समय क्या भावनाएं थीं?

जवाब: उस समय मन में ज्यादा कुछ नहीं चल रहा था, बस बहुत भावुक पल था। जब राष्ट्रगान बज रहा था और तिरंगा सबसे ऊपर जा रहा था तो मुझे बहुत गर्व महसूस हुआ। उस भावना को शब्दों में बताना मुश्किल है।

सवाल: भारतीय मुक्केबाजों ने सात स्वर्ण सहित ऐतिहासिक प्रदर्शन किया। बीते कुछ समय में भारतीय मुक्केबाजी में कितना बदलाव आया है?

जवाब: भारतीय मुक्केबाजी बहुत तेजी से आगे बढ़ रही है। पहले जब हम अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिताओं में जाते थे तो भारत को बहुत मजबूत टीम नहीं माना जाता था। अब स्थिति बदल चुकी है। आज विरोधी को पता चलता है कि उसका मुकाबला भारतीय मुक्केबाज से है तो वह जानता है कि यह आसान मुकाबला नहीं होगा। कई खिलाड़ी तो चाहते हैं कि उनका मुकाबला भारत से न पड़े। यह खिलाड़ियों, प्रशिक्षकों और सहयोगी स्टाफ की वर्षों की मेहनत का परिणाम है। हमने सात स्वर्ण जीतकर इतिहास बनाया है।

सवाल: सात में से पांच स्वर्ण भिवानी के मुक्केबाजों ने जीते। आखिर क्या भिवानी को इतना विशेष बनाता है?

जवाब: भिवानी को ‘मिनी क्यूबा’ यूं ही नहीं कहा जाता। यहां खेलों का माहौल है, खान-पान अच्छा है और सबसे बड़ी बात परिवार का सहयोग मिलता है। माता-पिता बच्चों की डाइट से लेकर रिकवरी तक का ध्यान रखते हैं और प्रतियोगिताओं में भी उनके साथ जाते हैं। यही माहौल चैम्पियन तैयार करता है।

सवाल: अब सितम्बर में एशियाई खेल हैं, जहां चीन और कजाखस्तान जैसे मजबूत देश होंगे। क्या अपने खेल में कुछ विशेष बदलाव करेंगी?

जवाब: मुक्केबाजी में एशियाई देश दुनिया के सबसे मजबूत देशों में शामिल हैं। इसलिए मुकाबला कठिन होगा। अभी प्रशिक्षण शिविर में अपने प्रशिक्षकों के साथ बैठकर हर प्रतिद्वंद्वी के हिसाब से रणनीति तैयार करूंगी। किसके विरुद्ध कौन-सी तकनीक और कौशल इस्तेमाल करना है, इस पर विशेष काम करना होगा।

सवाल: राष्ट्रमंडल खेलों के स्वर्ण के बाद एशियाई खेलों में आपसे उम्मीदें बढ़ी हैं। ये उम्मीदें आत्मविश्वास बढ़ाती हैं या दबाव?

जवाब: दबाव भी रहता है और आत्मविश्वास भी बढ़ता है। लोग चाहते हैं कि मैं अच्छा प्रदर्शन करूं, लेकिन मैं पदक के बारे में ज्यादा नहीं सोचती। मेरा ध्यान एक समय में सिर्फ एक मुकाबले और उसमें अपना सर्वश्रेष्ठ देने पर रहता है।

सवाल: साई और खेल मंत्रालय से मिल रहे सहयोग को कैसे देखती हैं?

जवाब: सरकार से हमें काफी सहयोग मिल रहा है। खेल बजट बढ़ने से बुनियादी ढांचे और खिलाड़ियों की जरूरतों पर ज्यादा काम हो सकेगा। राष्ट्रमंडल खेलों से पहले हमें बेलफास्ट में प्रशिक्षण का अवसर मिला था। वहां दूसरे देशों के मुक्केबाजों के साथ अभ्यास किया। जिन चार खिलाड़ियों से मेरा मुकाबला होना था, उनमें से तीन के साथ मैं पहले ही अभ्यास कर चुकी थी। इससे उनकी तकनीक समझने और रणनीति बनाने में काफी मदद मिली। ऐसे विदेशी प्रशिक्षण शिविर हमारे प्रदर्शन में बड़ा अंतर पैदा करते हैं।

सवाल: 2030 राष्ट्रमंडल खेल भारत में होंगे। घरेलू दर्शकों के सामने खेलने को लेकर कितनी उत्साहित हैं?

जवाब: यह बहुत अच्छी बात है कि भारत 2030 राष्ट्रमंडल खेलों की मेजबानी करेगा। अपने देश में खेलने का अलग ही फायदा होता है। जब अपने दर्शक आपका उत्साह बढ़ाते हैं तो आत्मविश्वास और प्रेरणा दोनों बढ़ते हैं और खिलाड़ी बेहतर प्रदर्शन करता है। राष्ट्रमंडल खेल बहुत बड़ा मंच है। उम्मीद है कि भारत इसकी सफल मेजबानी करेगा। अगर हमें 2036 ओलम्पिक की मेजबानी का मौका मिलता है तो मुझे विश्वास है कि भारत उसका भी शानदार आयोजन कर सकता है।

सवाल: भारतीय मुक्केबाजी की मौजूदा पीढ़ी को देखकर क्या ओलम्पिक में अब एक-दो से ज्यादा पदकों की उम्मीद की जा सकती है?

जवाब: बिल्कुल। भारत में मुक्केबाजी लगातार आगे बढ़ रही है और हमारे खिलाड़ी विश्व स्तर पर अच्छा प्रदर्शन कर रहे हैं। आने वाले ओलम्पिक में भारतीय मुक्केबाजी से दो से तीन पदकों की उम्मीद की जा सकती है।

सवाल: अगले दो वर्षों में खुद को कहां देखती हैं?

जवाब: मेरा सबसे बड़ा लक्ष्य लास एंजिलिस ओलम्पिक है। अगले साल से क्वालीफायर शुरू होंगे। सबसे पहले मैं ओलम्पिक के लिए क्वालीफाई करना चाहती हूं और फिर वहां भारत के लिए अपना सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन करते हुए पदक जीतना मेरा सपना है।

(साभार दैनिक जागरण)

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