देवभूमि की खेलभूमि का देवदूत हरेन्द्र सिंह चौधरी

खेल की पाठशालाः बेटियों के सपनों को पंख लगाने का जुनून

खेल पदक जीतने का माध्यम नहीं, जीवन गढ़ने का संस्कार

श्रीप्रकाश शुक्ला

देहरादून। देवभूमि उत्तराखंड को खेलभूमि बनाने के सरकारी प्रयासों को आगे बढ़ाने का जिम्मा एक जांबाज एथलीट ने अपने तरीके से लिया है। देखा जाए तो खेलों की दुनिया में कुछ लोग अपनी उपलब्धियों से पहचान बनाते हैं तो कुछ अपनी उपलब्धियों को अगली पीढ़ी के सपनों की सीढ़ी बना देते हैं। देहरादून के अल्ट्रा मैराथन धावक और खेल प्रशिक्षक हरेन्द्र सिंह चौधरी भी इसी श्रेणी के व्यक्तित्व हैं।

जांबाज हरेन्द्र सिंह ने लम्बी दूरी की दौड़ से अर्जित अनुभव और संघर्ष की सीख को बच्चों और युवा खिलाड़ियों के भविष्य निर्माण से जोड़ने का जो सराहनीय प्रयास किया है, उसके दूरगामी परिणाम ताली पीटने वाले साबित होंगे इसमें कोई संदेह नहीं है। हरेन्द्र सिंह चौधरी की ‘खेल की पाठशाला’ का उद्देश्य प्रतिभाशाली बच्चों, विशेषकर बालिकाओं को खेल का अवसर, प्रशिक्षण और उचित मार्गदर्शन उपलब्ध कराना है। इस खेल की पाठशाला का मुख्य उद्देश्य देहरादून की बेटियों को 2036 ओलम्पिक खेलमंच तक पहुंचाना है।

हरेन्द्र सिंह चौधरी कहते हैं कि अल्ट्रा मैराथन केवल तेज दौड़ने का खेल नहीं है। यह धैर्य, अनुशासन, मानसिक मजबूती और लगातार आगे बढ़ते रहने की परीक्षा है। फिलवक्त वह अपनी खेल यात्रा से जो अनुभव अर्जित किए, वे अनुभव अब वह बेटियों के प्रशिक्षण में लगा रहे हैं। वह मैदान में बच्चों को केवल खेल की तकनीक नहीं सिखाते बल्कि संघर्ष से जूझने और लक्ष्य के लिए निरंतर मेहनत करने की प्रेरणा भी देते हैं।

आज जब देश महिला खिलाड़ियों की उपलब्धियों पर गर्व कर रहा है, तब बालिकाओं को कम उम्र से ही खेलों से जोड़ना अत्यंत महत्वपूर्ण है। हरेन्द्र चौधरी की खेल पाठशाला इसी दिशा में काम कर रही है। सबसे उल्लेखनीय बात यह है कि इस पहल का लक्ष्य बालिकाओं को निःशुल्क प्रशिक्षण देकर वर्ष 2036 के ओलम्पिक के लिए तैयार करना है। यह सोच किसी एक प्रतियोगिता या एक पदक तक सीमित नहीं है, यह लगभग एक दशक आगे की खेल प्रतिभा तैयार करने की दीर्घकालिक दृष्टि है। राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहचान बनाने वाली छात्राओं का सम्मान और उन्हें खेल सामग्री उपलब्ध कराना भी इसी प्रयास का हिस्सा रहा है।

डॉ. हरेन्द्र चौधरी की पुस्तक ‘सपनों से शिखर तक’ का शीर्षक ही उनकी सोच को स्पष्ट करता है। सपना देखना पहला कदम है, लेकिन उसे उपलब्धि में बदलने के लिए अनुशासन, संघर्ष और निरंतर प्रयास जरूरी हैं। एक खेल प्रशिक्षक के लिए इससे बड़ी उपलब्धि क्या होगी कि उसके सामने तैयार हो रहा खिलाड़ी उससे आगे निकले और देश के लिए सम्मान अर्जित करे।

खेलपथ की नजर में क्यों महत्वपूर्ण है यह प्रयास?

भारत में खेल प्रतिभाओं की कमी नहीं है। कमी अक्सर उन्हें समय पर पहचानने, प्रशिक्षित करने और सही दिशा देने की होती है। विशेषकर छोटे शहरों और सरकारी विद्यालयों के बच्चों के लिए संसाधनों और मार्गदर्शन की चुनौती बड़ी होती है। ऐसे में ‘खेल की पाठशाला’ जैसी पहल खेलों को जमीनी स्तर तक पहुंचाने का महत्वपूर्ण माध्यम बन सकती हैं। हरेन्द्र सिंह चौधरी का प्रयास इसलिए भी सराहनीय है क्योंकि उन्होंने स्वयं खिलाड़ी के रूप में जो संघर्ष देखा, उसे अगली पीढ़ी के लिए अवसर में बदलने का संकल्प लिया है।

किसी धावक की असली पहचान केवल उसके द्वारा पूरी की गई दूरी से नहीं होती। असली पहचान तब बनती है जब वह अपने अनुभव से दूसरों की राह आसान करे। हरेन्द्र सिंह चौधरी की यात्रा इसी दिशा में जाती दिखाई देती है। उनकी खेल पाठशाला के बच्चों की उपलब्धियां आने वाले वर्षों में इस प्रयोग की सफलता की सबसे बड़ी कसौटी होंगी। यदि आज प्रशिक्षण पा रही बेटियों में से कोई खिलाड़ी कल राष्ट्रीय टीम की जर्सी पहनती है, एशियाई खेलों या ओलम्पिक में भारत का प्रतिनिधित्व करती है, तो उसकी सफलता में इस छोटी-सी खेल पाठशाला की बड़ी भूमिका होगी।

बड़े-बड़े खेल मैदान ही नहीं, जमीनी समस्याएं दूर करना भी जरूरी

आज खेलों के प्रति आमजन में दिलचस्पी बढ़ रही है। सरकार भी प्रयासरत हैं लेकिन यह ध्यान देना होगा कि आज देश को बड़े-बड़े स्टेडियम नहीं, बड़ी सोच वाली खेल पाठशालाओं की जरूरत है। हरेन्द्र सिंह चौधरी का प्रयास इसी सोच का नायाब उदाहरण है। मैदान में पसीना बहाने वाले बच्चों को यदि सही मार्गदर्शन, प्रोत्साहन और अवसर मिले, तो भारत की खेल शक्ति को नई ऊंचाइयों तक पहुंचाया जा सकता है। खेलपथ हरेन्द्र सिंह चौधरी की इस पहल को सलाम करता है और उम्मीद करता है कि ‘खेल की पाठशाला’ से निकलने वाली प्रतिभाएं आने वाले समय में उत्तराखण्ड ही नहीं, पूरे देश का गौरव बढ़ाएंगी।

दौड़ को जुनून और युवाओं को दिशा देने वाले हरेन्द्र सिंह चौधरी

देहरादून के हरेन्द्र सिंह चौधरी उन धावकों में हैं जिन्होंने लम्बी दूरी की दौड़ को केवल व्यक्तिगत उपलब्धि का माध्यम नहीं माना, बल्कि इसे युवाओं में अनुशासन, आत्मविश्वास और स्वस्थ जीवनशैली विकसित करने का माध्यम बनाया। अल्ट्रा मैराथन जैसी कठिन स्पर्धा में भारत और उत्तराखंड का प्रतिनिधित्व करने वाले चौधरी की खेल यात्रा संघर्ष, संकल्प और निरंतर साधना की कहानी है।

वर्ष 2015 में 135 किलोमीटर अल्ट्रा मैराथन में एशियन चैम्पियन बनने की उपलब्धि उनके खेल जीवन का महत्वपूर्ण पड़ाव रही। अल्ट्रा मैराथन में सामान्य मैराथन से कहीं अधिक दूरी तय करनी होती है और इसके लिए शारीरिक क्षमता के साथ मानसिक दृढ़ता की भी बड़ी आवश्यकता होती है। हरेन्द्र की विशेषता यह है कि उन्होंने अपनी सफलता को अपने तक सीमित नहीं रखा। वर्ष 2017 में वे उत्तराखंड के विभिन्न जिलों के युवा धावकों को 100 किलोमीटर अल्ट्रा मैराथन के लिए तैयार कर रहे थे। देहरादून के साथ रुड़की, अल्मोड़ा और उत्तरकाशी के युवक-युवतियां उनसे प्रशिक्षण ले रहे थे। उनकी टीम में लड़कियों को भी समान अवसर देना उनके व्यापक खेल दृष्टिकोण को दर्शाता है।

उनका मानना है कि खिलाड़ी को मैदान में उतरने से पहले अपने भीतर जीत का विश्वास पैदा करना चाहिए। इसी सोच के साथ उन्होंने उत्तराखंड की अलग अल्ट्रा मैराथन टीम तैयार करने का प्रयास किया, ताकि प्रदेश के प्रतिभाशाली धावकों को राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय मंच मिल सके।

खिलाड़ी से प्रशिक्षक और मार्गदर्शक तक

हरेन्द्र सिंह चौधरी की सबसे बड़ी उपलब्धि शायद केवल उनके पदक नहीं हैं, बल्कि वे युवा खिलाड़ियों को जिस तरह तैयार करने का काम कर रहे हैं, वह है। आज वे अंतरराष्ट्रीय अल्ट्रा रनर के साथ-साथ स्पोर्ट्स कोच, मेंटर और स्पोर्ट्स एडमिनिस्ट्रेटर के रूप में भी सक्रिय हैं। उनके जीवन और खेल-दर्शन पर आधारित पुस्तक ‘सपनों से शिखर तक- अनुशासन, संघर्ष और सफलता की कहानी’ भी प्रकाशित हुई है।

खेल की पाठशाला के फाउंडर हरेन्द्र सिंह चौधरी अंतरराष्ट्रीय धावक, एशिया चैम्पियन, वर्ल्ड चैम्पियन के साथ ही गिनीज वर्ल्ड बुक ऑफ लंदन रिकॉर्ड होल्डर भी हैं। उनकी खेल सोच में अनुशासन, निरंतर अभ्यास, मानसिक मजबूती और असफलताओं से सीखने को विशेष महत्व दिया गया है। यही कारण है कि उनकी भूमिका एक धावक से आगे बढ़कर युवा खिलाड़ियों के मार्गदर्शक की बन गई है। उनके प्रयासों में ‘खेल की पाठशाला’ जैसी पहल भी शामिल है, जिसके माध्यम से युवा खिलाड़ियों को प्रशिक्षण, मार्गदर्शन और खेल के प्रति प्रेरणा देने का प्रयास किया जा रहा है।

उत्तराखंड के खेल आंदोलन के लिए महत्वपूर्ण योगदान

उत्तराखंड जैसे पर्वतीय राज्य में लम्बी दूरी की दौड़ के लिए प्राकृतिक परिस्थितियां और प्रतिभा दोनों मौजूद हैं। आवश्यकता है तो उन्हें सही प्रशिक्षण, वैज्ञानिक मार्गदर्शन और उचित अवसर देने की। हरेन्द्र सिंह चौधरी का योगदान इसी दिशा में महत्वपूर्ण दिखाई देता है। उन्होंने यह संदेश दिया है कि खेल में सफलता केवल पदक जीतने का नाम नहीं है। यदि एक खिलाड़ी अपने अनुभव से दूसरे खिलाड़ियों के सपनों को उड़ान देता है, तो उसकी उपलब्धि का दायरा कहीं बड़ा हो जाता है।

आज जब देश फिट इंडिया, स्वस्थ भारत और खेलो इंडिया जैसे अभियानों के माध्यम से युवाओं को खेलों से जोड़ने की दिशा में आगे बढ़ रहा है, तब हरेन्द्र सिंह चौधरी जैसे खिलाड़ी और प्रशिक्षक प्रेरणा के स्रोत बन सकते हैं। हरेन्द्र सिंह चौधरी की कहानी दरअसल एक ऐसी दौड़ है, जिसमें मंजिल केवल स्वयं तक पहुंचना नहीं, बल्कि अपने साथ अनेक युवा प्रतिभाओं को आगे बढ़ाना है। यही उनके खेल जीवन की सबसे बड़ी सार्थकता है।

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