मेडिकल एडवोकेसी का नायाब अनुसंधान मॉडल बना विटिलिगो
भारत में 19 मई, 2009 को मना था पहला 'नेशनल विटिलिगो डे'
विटिलिगो सपोर्ट इंडिया प्रतिमाह गांव-कस्बों में चलाए जागरूकता मुहिम
श्रीप्रकाश शुक्ला
मथुरा। समय दिन-तारीख देखकर आगे नहीं बढ़ता। आपका एक प्रयास समाज की सोच बदल सकता है। मेडिकल साइंस ने भी बता दिया है कि सफेद दाग अछूत रोग नहीं बल्कि एक त्वचा विकार है। हमें समाज की सोच को बदलने के लिए कुछ विशिष्ट करना होगा। त्वचा विकार ने मेडिकल एडवोकेसी को एक ऐसा मॉडल दिया है जो बदलाव लाता है। यह दिखाता है कि मरीज़ों की पहल कैसे लोगों की सोच बदल सकती है, मरीज़ों को सशक्त बना सकती है, कानूनी ढांचे पर असर डाल सकती है तथा फार्मास्युटिकल निवेश को आकर्षित कर सकती है।
बहुत कम समय में वर्ल्ड विटिलिगो डे जमीनी स्तर के आंदोलन से एक वैश्विक ताकत बन चुका है। इसने विटिलिगो के बारे में लोगों की बातचीत का तरीका बदला है तथा फ़ार्मास्युटिकल कम्पनियों की अभूतपूर्व दिलचस्पी बढ़ाई है। विटिलिगो सपोर्ट इंडिया इस जागरूकता मुहिम को नया आयाम नई पहचान देने को प्रतिबद्ध है। जागरूकता मुहिम निरंतर चले इसके लिए संस्थान को आपका तन-मन से प्रोत्साहन जरूरी है।
देखा जाए तो वर्ल्ड विटिलिगो डे की शुरुआत कई इलाकों में चल रही अलग-अलग जागरूकता मुहिमों से हुई है। भारत में पहली दफा डॉ. सविता मल्होत्रा ने 19 मई, 2009 को 'नेशनल विटिलिगो डे' शुरू किया था, जोकि 2009 से 2015 तक मनाया गया। बाद में प्रो. दविंदर प्रसाद ने तीन राष्ट्रीय डर्मेटोलॉजिकल सोसायटियों को एक साथ लाकर वर्ल्ड विटिलिगो डे को मंज़ूरी दिलाई।
वर्ल्ड विटिलिगो डे की दिशा में एक अहम कदम 25 जून, 2011 को उठाया गया, जब नाइजीरिया में विटसैफ़ की ओगो माडुवेसी ने "पर्पल फन डे" इवेंट आयोजित किया। यह इवेंट माइकल जैक्सन की बरसी पर आयोजित किया गया था ताकि विटिलिगो के साथ उनके जीवन भर के संघर्ष को याद किया जा सके। इसका मकसद अफ्रीका में इस बीमारी से जुड़े कलंक के बारे में जागरूकता फैलाना और उससे लड़ना था।
दुनिया भर में तालमेल बिठाने के मौके को देखते हुए, अमेरिका की नॉन-प्रॉफिट संस्था 'विटिलिगो रिसर्च फाउंडेशन' ने 25 जून को आधिकारिक तौर पर 'वर्ल्ड विटिलिगो डे' घोषित किया। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर समन्वित पहला वर्ल्ड विटिलिगो डे 2012 में रोम की गुग्लिएल्मो मार्कोनी यूनिवर्सिटी में एक प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान आयोजित किया गया था, जिसकी अगुवाई प्रो. टोरेलो लोटी और यान वैले ने की थी।
वर्ल्ड विटिलिगो डे की सफलता की एक खास बात इसका 'रोलिंग हेडक्वार्टर मॉडल' है, जिसमें दुनिया भर में ज़्यादा से ज़्यादा लोगों को जोड़ने के लिए हर साल मेज़बान देश बदलता रहता है। 2012 से 2025 के बीच मेज़बान देशों में इटली, भारत, चीन, चेक गणराज्य, ब्राज़ील, अमेरिका, वियतनाम, सर्बिया, इंडोनेशिया, मैक्सिको, कज़ाकिस्तान, कोलम्बिया और कनाडा शामिल रहे।
राष्ट्रीय स्तर पर वर्ल्ड विटिलिगो डे स्थानीय रीति-रिवाजों के हिसाब से खुद को ढालता है। उदाहरण के लिए, अमेरिका और यूरोपीय संघ में तरह तरह के इवेंट हर साल अलग-अलग राज्यों या शहरों में आयोजित किए जाते हैं जबकि चीन और भारत में गतिविधियाँ लगातार जानी-पहचानी जगहों पर होती हैं। इस लचीले तरीकों ने क्षेत्रीय जागरूकता मुहिमों को मज़बूत करते हुए वैश्विक स्तर पर इसके विस्तार को बनाए रखा है। खेलपथ का आग्रह है कि विटिलिगो सपोर्ट इंडिया से जुड़ा हर पदाधिकारी और सदस्य प्रतिमाह अपने-अपने गांव, शहर और कस्बों में कोई न कोई मुहिम चलाए ताकि समाज की सोच को बदला जा सके। यह सब सम्भव है क्योंकि आपमें हिम्मत है।
