ऐतिहासिक वनखंडेश्वर विद्यापीठ की दुर्दशा का जिम्मेदार कौन?
आओ हम सब मिलकर वनखंडेश्वर विद्यापीठ के उत्थान का संकल्प लें
जयंत सिंह तोमर
मुरैना। एक तरफ हमारी हुकूमतें शिक्षा पर अरबों रुपये पानी की तरह बहा रही हैं तो दूसरी ओर ऐतिहासिक वनखंडेश्वर विद्यापीठ अपनी दुर्दशा पर आंसू बहा रही है। इस ऐतिहासिक शिक्षा मंदिर की शुरुआत 1990 में प्रसिद्ध विद्वान प्रोफ़ेसर रामसिंह तोमर ने की थी। प्रोफ़ेसर तोमर ने साल 1945 से साल 2000 की अवधि में पचास वर्ष का कालखंड गुरुदेव रवीन्द्रनाथ ठाकुर के आश्रम शांति निकेतन में अध्यापक एवं आश्रमिक के रूप में व्यतीत किया। आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी जी के बाद वे हिन्दी भवन के आचार्य एवं अध्यक्ष रहे।
मुरैना जिले की अम्बाह तहसील में क्वारी नदी के बीहड़ों में वनखंडेश्वर विद्यापीठ केन्द्रीय माध्यमिक शिक्षा मंडल से सम्बद्ध आवासीय विद्यालय है। यहां नर्सरी से लेकर बारहवीं कक्षा तक की पढ़ाई होती है। स्कूल को सरकार की ओर सत्ताईस बीघा जमीन का पट्टा मिला है जिसमें शिक्षकों के आवास, छात्रावास, स्कूल भवन, लाइब्रेरी आदि हैं।
प्रोफ़ेसर रामसिंह तोमर को साल 1951 से 55 के बीच भारत सरकार ने हिन्दी के अध्यापन के लिए इटली भेजा था। पांच साल की अवधि में उनके जिनसे सम्पर्क और संबंध बने स्कूल की स्थापना में उनमें से अनेकों का सहयोग मिला। स्कूल का अस्पताल भवन, छात्रावास, शिक्षक निवास, स्कूल भवन आदि इटली के ही सज्जनों के सहयोग से बना है।
प्रोफ़ेसर रामसिंह तोमर ने अपनी जन्मभूमि का ऋण चुकाने के लिए गुरुदेव रवीन्द्रनाथ ठाकुर के दर्शन और चिंतनधारा के अनुरूप इस क्षेत्र के साधारण लोगों के बच्चों के लिए यह स्कूल खोला था। पैंतीस साल चलने के बाद स्कूल में विद्यार्थियों की संख्या अचानक कम हो गई। जहां कभी छह सौ-सात सौ बच्चे पढ़ते थे वहां अब मात्र अस्सी बच्चे हैं। इस स्थिति में पहुंचने के बहुत से कारणों में एक है पिछले कई वर्षों से स्कूल की संचालनकारी समिति की बैठक का न होना।
इस बार तीस जून तक सीबीएसई से स्कूल की मान्यता का नवीनीकरण होना था। इसमें समिति के रिन्यूअल के कागज भी लगने थे। लेकिन 25 अप्रैल तक न तो समिति और न स्कूल के जिम्मेदार लोग इस दिशा में सक्रिय हुए। इन पंक्तियों के लेखक ने बीते वर्ष के अगस्त माह से लगातार स्कूल की प्रगति की जानकारी के लिए कई पत्र स्कूल के सचिव को स्पीड पोस्ट व ई-मेल के माध्यम से भेजे, लेकिन किसी का कोई उत्तर नहीं मिला।
विवश होकर 28 अप्रैल को वह पत्र समिति के कार्यालय के द्वार पर लगा कर 1 मई से वनखंडेश्वर महादेव मंदिर के प्रांगण में 'वनखंडेश्वर विद्यापीठ शुभचिंतक समूह' ने शांतिपूर्ण सत्याग्रह शुरू किया गया। समिति के पदाधिकारी व सदस्यों को विधिवत सूचना दी गई जिसमें बताया गया कि पच्चीस मई से नौतपा के सबसे गर्म दिन की शुरुआत से क्रमिक अनशन प्रारंभ होगा।
दो बिन्दुओं के एजेंडे पर समिति की बैठक होने में पच्चीस दिन लग गए। बैठक में तय हुआ कि समिति का फर्म्स एंड सोसाइटीज में रिन्यूअल और सीबीएसई में स्कूल की मान्यता के रिन्यूअल के लिए जरूरी दस्तावेज तीस जून तक जमा कर दिए जायेंगे। स्कूल की मान्यता के लिए यह औपचारिकता तीस जून तक पूरी न होने पर एक लाख रुपए की पेनल्टी का प्रावधान है। यह सब जानते हुए भी समिति ने निर्णय लेने में जिस तरह की शिथिलता बरती है वह आश्चर्यजनक तो है ही, कई सवाल भी खड़े करती है।
समिति के अधिकांश पदाधिकारी और सदस्य यह मान चुके हैं कि स्कूल अब दोबारा खड़ा नहीं हो सकता। जबकि बीते कुछ समय में इन पंक्तियों के लेखक ने वनखंडेश्वर शुभचिंतक समूह के साथ जब आसपास के गांवों का भ्रमण किया तो बड़ी संख्या में अभिभावकों ने अपने बच्चों को वनखंडेश्वर में प्रवेश कराने की इच्छा जताई। अभिभावकों का केवल यह कहना है कि बच्चों के लिए वाहन व्यवस्था और अच्छे शिक्षकों की व्यवस्था होनी चाहिए। तब से शुभचिंतक समूह के सदस्य लगातार पर्चे छपवाकर प्रचार अभियान में तो लगे ही हैं, वाहन व्यवस्था और अच्छे शिक्षकों की तलाश में लगे हैं।
स्कूल की सुचारू व्यवस्था के संबंध में समिति के पदाधिकारी व सदस्यों को लगातार सुझाव और प्रस्ताव भेजे जा रहे हैं लेकिन समिति के सदस्य मौन हैं। कायदे से स्कूल की आवश्यकताओं के विषय में प्रिंसिपल समिति के सचिव को अवगत कराते हैं फिर समिति की बैठक में उन विषयों पर विचार होता है। समिति के सदस्य भी सचिव के माध्यम से या सीधे अपने प्रस्ताव अध्यक्ष को समिति की बैठक में विचार के लिए भेज सकते हैं लेकिन वनखंडेश्वर विद्यापीठ में यह प्रक्रिया ठप पड़ी हुई है।
वनखंडेश्वर विद्यापीठ चम्बल क्षेत्र के वातावरण को बदलने का एक प्रकल्प है। संस्थापक प्रोफ़ेसर रामसिंह तोमर के आदर्शों से जो महानुभाव परिचित हैं वे समझ सकते हैं कि इस प्रकल्प को खड़ा करने के लिए उन्होंने क्या क्या नहीं किया। अपने जीवन की जमा-पूंजी उन्होंने इस विद्यालय में लगा दी। देश और विदेश के मित्रों से सहयोग लिया। इस सबके पीछे एक बड़ा सपना था। वह ये कि चम्बल क्षेत्र के परिवेश में सार्थक बदलाव आये। आज जब वनखंडेश्वर विद्यापीठ चिंताजनक स्थिति में है तब यहां से पढ़कर निकले विद्यार्थियों का यह नैतिक दायित्व है कि वे आगे आयें और स्कूल को मौजूदा संकट से उबारने में अपनी भूमिका निभाएं।
हम अभी इस प्रश्न पर विचार करके कोई अप्रिय स्थिति नहीं बनाना चाहते कि स्कूल ऐसे संकट में कैसे पड़ा। अभी केवल इसी विषय पर विचार करना चाहते हैं कि वनखंडेश्वर विद्यापीठ की उन्नति कैसे हो। इसी प्रश्न पर विचार करने के लिए आगामी 19 जुलाई (रविवार) को वनखंडेश्वर परिसर में एक चिंतन बैठक का आयोजन किया गया है। इस बैठक में सभी महानुभावों व पूर्व विद्यार्थियों की उपस्थिति प्रार्थनीय है।
समिति के पदाधिकारी व सदस्य यदि चिंतन प्रक्रिया में सम्मिलित होना चाहें तो उनके लिए भी एक सत्र आयोजित किया जा सकता है। इस समय में देश के शिक्षा, समाज व सार्वजनिक जीवन के महत्वपूर्ण महानुभावों को हमने विशेष प्रार्थना करके जोड़ा है। इसलिए हम सबकी यह जिम्मेदारी होगी कि इस समूह में सार्थक चर्चा करें। अभी यह चिंता करने का समय है वर्तमान संकट से स्कूल बाहर कैसे निकले। जो बीत गया, जो हो गया उस पर बाद में विचार कर सकते हैं।
वैसे तो जिस तरह देश में एक लाख सरकारी स्कूल बंद हुए हैं, वनखंडेश्वर विद्यापीठ को भी उनमें से एक मान कर निष्क्रिय बैठा जा सकता है। लेकिन वनखंडेश्वर विद्यापीठ हम सबके लिए किसी शांतिनिकेतन, टालस्टाय के यास्नाया पोल्याना या दुनिया के ऐसे ही वैकल्पिक स्कूलों से कम नहीं है। हमारे लिए ऐसे स्कूल का बंद होना किसी सपने की मृत्यु से कम नहीं है।
इस विषय में मैं निरंतर लिखकर सभी स्थितियों को आप सब शुभचिंतकों के सामने स्पष्ट करता रहूंगा। इस पर भी विमर्श करेंगे कि शिक्षा के तमाम आदर्श विकल्पों की स्थिति कैसी है। आप सब इस समूह से जुड़े रहें और वनखंडेश्वर विद्यापीठ धनसुला को सुरक्षित रखने में अपना अमूल्य योगदान दें, यही प्रार्थना।
