कभी पत्रकारिता व्यवसाय नहीं, एक ऋषिकर्म था

हिन्दी पत्रकारिता के 200 सालः घर फूंक तमाशा देख

खेलपथ विशेष

हिंदी के प्रथम समाचार पत्र ‘उदंत मार्तंड’ ने ‘पत्रकारिता की गंगोत्री’ की यात्रा ने गंगा सागर तट से निकलकर पूरे देश को उद्वेलित किया, उसकी दो सौवीं जयंती पर पूरे देश ने उसका भावपूर्ण स्मरण किया। हिंदी पत्रकारिता के इस महोत्सव ने नई पीढ़ी को अवगत कराया कि किस तरह हमारे पुरखों ने भारतीय समाज में जनजागरण, आजादी के संघर्ष और नव चेतना के निर्माण में योगदान दिया।

नई पीढ़ी को अहसास कराया कि कैसे पत्रकारों ने ‘घर फूंक तमाशा देख’ के जज्बे के साथ देश को आजाद करने में अपना सर्वस्व अर्पित किया। उनके लिये पत्रकारिता व्यवसाय नहीं था, एक ऋषिकर्म था। उन्होंने भारतीय समाज में लोकतांत्रिक मूल्यों की स्थापना और ‘स्वराज हमारा जन्मसिद्ध अधिकार’ के उद्घोष के साथ आजादी का स्वप्न जगाया।

हिंदी पत्रकारिता के दो सौ साल उत्सव के दौरान देशभर में हिंदी पत्रकारिता के अतीत व वर्तमान को लेकर व्यापक विचार-विमर्श हुआ। जगह-जगह सेमिनार व विचार गोष्ठियां हुईं। इस दौरान अनेक महत्वपूर्ण पुस्तकों का प्रकाशन हुआ, जिसकी शुरुआत सप्रे संग्रहालय भोपाल के संस्थापक व वरिष्ठ पत्रकार विजय दत्त श्रीधर के भगीरथ प्रयासों से तीन खंडों में प्रकाशित पुस्तक ‘समग्र भारतीय पत्रकारिता’ के रूप में हुई, जिसमें हिंदी पत्रकारिता के पहले चरण को ‘पहली सदी : 1780-1880’, दूसरे खंड को ‘तिलक युग 1881-1920’ तथा तीसरे खंड को ‘गांधी युग के रूप में 1921 से 1948’ तक समेटा गया। निश्चय ही हिंदी पत्रकारिता ने राजनीतिक चेतना जगाने का ही काम नहीं किया, बल्कि सामाजिक चेतना, अंधविश्वास के खिलाफ जनजागरण और स्वदेशी आंदोलन के जरिये आर्थिक आजादी के लिए भी काम किया।

हिंदी पत्रकारिता के जनक पं. युगलकिशोर शुक्ल व मनीषी सम्पादकों को समर्पित पुस्तक ‘हिंदी पत्रकारिताः 200 साल की महागाथा’ में बताने का प्रयास किया गया कि कैसे उदंत मार्तंड के प्रणव मंत्र ‘हिंदुस्तानियों के हित के हेतु’ का पालन हमारे पुरखों ने किया। साथ ही सवाल भी पैदा किया कि क्या आज इसका निर्वहन हो रहा है। इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र के सचिव डॉ. सच्चिदानंद जोशी व विजय दत्त श्रीधर के सम्पादन में प्रकाशित पुस्तक का पुरोवाक‍् पद्मभूषण रामबहादुर राय ने लिखा है।

पुस्तक में—उदंत मार्तंड से मूल अधिकारों तक, हिंदीतर भाषियों के अवदान, जिम्मेदारी का अहसास कराती द्विशतवार्षिकी, जन-आंदोलन और हिंदी पत्रकारिता, सांस्कृतिक, साहित्यिक, कृषि, बाल, आंचलिक-पत्रकारिता, परदे पर पत्रकारिता, हिंदी पत्रकारिता की भाषा, ई-पत्रकारिता की जिम्मेदारी, रेडियो, महिला, पर्यावरण, रक्षा, खेल, रक्षा धार्मिक व आध्यात्मिक पत्रकारिता पर सारगर्भित लेख संकलित हैं। इसके अलावा जनसंचार के सरोकार, पूर्वोत्तर की हिंदी पत्रकारिता, विज्ञान व प्रौद्योगिकी पत्रकारिता तथा कार्टून पत्रकारिता पर सारगर्भित लेख संकलित हैं। निश्चय ही प्रभात प्रकाशन से प्रकाशित पुस्तक नई पीढ़ी के पत्रकारों के लिए मार्गदर्शक साबित होगी।

हिंदी पत्रकारिता के हिंदीतर उन्नायक

यह हिंदी पत्रकारिता का सौभाग्य रहा है कि इसके उन्नयन और विस्तार में उन हिंदीतर भाषी संपादकों का महत्वपूर्ण योगदान रहा है, जिनकी मातृभाषा हिंदी नहीं थी, लेकिन वे हिंदी पत्रकारिता के अग्रदूत बने। उन्होंने हिंदी को राष्ट्रभाषा का दर्जा दिलाने को भी भरसक प्रयास किए। ‘छत्तीसगढ़ मित्र’ के संपादक माधवराव सप्रे से लेकर ‘आज’ के संपादक बाबूराव विष्णु पराड़कर तक ऐसे संपादकों की लम्बी शृंखला है, जिन्होंने न केवल हिंदी पत्रकारिता को समृद्ध किया, बल्कि नई पीढ़ी के मार्गदर्शक भी बने। पराड़कर जी को हिंदी की मानक व बोधगम्य वर्तनी व वाक्य विन्यास शैली तैयार करने का श्रेय जाता है।

पत्रकारिता के अध्यापन से लम्बे समय तक जुड़े रहे प्रो. श्रीकांत सिंह ने हिंदी पत्रकारिता के हिंदीतर उन्नायकों से नई पीढ़ी को अवगत कराने के लिए श्रमसाध्य कार्य किया है। पुस्तक बताती है कि कैसे स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान ‘हिंदी केसरी’ के जरिये ‘स्वराज मेरा जन्मसिद्ध अधिकार’ का उद्घोष किया। बांग्लाभाषी अमृतलाल चक्रवर्ती द्वारा हिंदी पत्रकारिता के लिए किए गए नये प्रयोगों तथा मराठीभाषी लक्ष्मण नारायण गर्दे को हिंदी पत्रकारिता में साक्षात्कार विधा का सूत्रपात करने के लिए स्मरण किया।

साथ ही बांग्लाभाषी बालू चिंतामणि घोष का उल्लेख हिंदी की सर्वश्रेष्ठ पत्रिका ‘सरस्वती’ के प्रकाशन के लिए याद किया। हिंदी पत्रकारिता के हिंदीतर उन्नायक पुस्तक में राजा राममोहन राय, गोविंद रघुनात थत्ते, श्याम सुन्दर सेन, चिंतामणि घोष, केशवराम भट्ट, मोहनदास कर्मचंद गांधी, प्रो. इंद्र विद्या वाचस्पति, लाला जगत नारायण, सत्यदेव विद्यालंकार, क्षितीन्द्र मोहन मित्र, सी. बालकृष्ण राव, राहुल बारपुते व नारायणदत्त जी के योगदान का भावपूर्ण स्मरण किया गया है।

पारखी दृष्टि में समग्र पत्रकारिता

भारतीय जनसंचार संस्थान में रणनीतिक संचार विभाग के संस्थापक अध्यक्ष प्रो. प्रमोद कुमार के संपादन में प्रकाशित इस पुस्तक में उन टिप्पणियों, लेख व समीक्षाओं का संकलन है, जो विजय दत्त श्रीधर के तीन खंडों में प्रकाशित ‘समग्र भारतीय पत्रकारिता’ पर केंद्रित है। पुस्तक में प्रो. रमेश चन्द्र शाह की टिप्पणी— वृहत‍् संहिता, रामबहादुर राय की रचना- भारतीय पत्रकारिता का पहला आधार ग्रंथ, हरिवंश- भारतीय पत्रकारिता का पुराण, गिरीश्वर मिश्र- भारतीय पत्रकारिता के स्वरूप और गठन का संधान, प्रो. कृपाशंकर- भारतीय पत्रकारिता का प्रमाणिक इतिहास, विकास मिश्र- समग्र भारतीय पत्रकारिता: गागर में सागर, अंजुम शर्मा- भारत को गढ़ती पत्रकारिता का विराट संकलन आदि विचारोत्तेजक लेख व समीक्षाएं संकलित हैं जो निश्चय ही पत्रकारिता के छात्र-छात्राओं के लिए बेहद उपयोगी साबित होंगी।

द्विशताब्दी यात्रा और पत्रिकाओं का जज्बा

देश के पत्रकारिता जगत में ‘उदंत मार्तंड’ के दो सौ साल पूरे होने पर जो उत्साह नजर आया, उसी तरह का रचनात्मक उत्साह पत्रिकाओं में भी नजर आया। केंद्र सरकार की साहित्यिक पत्रिकाओं, मूल्यों के लिए प्रतिबद्ध निजी संस्थानों व मीडिया संस्थानों की पत्रिकाओं में द्विशताब्दी यात्रा के प्रसंगवश पत्रकारिता को विभिन्न आयामों पर सार्थक विमर्श नजर आया। इसी क्रम में ‘भारतीय जन संचार संस्थान’ की त्रैमासिक शोध पत्रिका ‘संचार माध्यम’ इस बार ‘हिंदी पत्रकारिता की द्विशताब्दी’ शीर्षक से प्रकाशित हुई है।

प्रधान संपादक डॉ. प्रज्ञा पालीवाल गौड़ व संपादक प्रो. प्रमोद कुमार के संपादन में प्रकाशित पत्रिका में देश के चोटी के संपादकों, पत्रकारों व लेखकों के लेख पत्रकारिता के छात्रों के लिए मार्गदर्शक की भूमिका निभाएंगे, जिसमें उदंत मार्तंड की द्विशताब्दी, दो सौ वर्षों का पुनरावलोकन, हिंदी पत्रकारिता में संपादक संस्था का विकास, पत्रकारिता की विकास यात्रा, मूर्धन्य संपादकों का स्मरण, पत्रकारिता में आकाशवाणी का योगदान, हिंदी के प्रसार में दूरदर्शन की भूमिका, दक्षिण भारत की हिंदी पत्रकारिता, पूर्वोत्तर की हिंदी पत्रकारिता, वैज्ञानिक जागरूकता में पत्रकारिता के योगदान, हिंदी पत्रकारिता और आर्यसमाज तथा आपातकाल, मीडिया व साहित्य आदि विचारोत्तेजक लेख शामिल हैं।

केंद्रीय हिंदी निदेशालय की साहित्यिक पत्रिका ‘भाषा’ ने इस मौके पर ‘हिंदीतर भाषी प्रांतों की हिंदी पत्रकारिता’ के विशेष संदर्भ में विशेषांक निकाला है। प्रधान संपादक हितेंद्र कुमार मिश्र व संपादक मंडल की अंजू सिंह व प्रदीप कुमार ठाकुर के संपादन में प्रकाशित इस 315 पेजों के विशेषांक में संजीव भनावत के ‘गैर हिंदी कलम की ताकत से समृद्ध हुई हिंदी पत्रकारिता’ लेख के अलावा स्वतंत्रता आंदोलन में भाषाई पत्रकारिता के योगदान, महाराष्ट्र, पंजाब, पूर्वोत्तर, बंगाल के हिंदी पत्रकारिता में योगदान पर लेख संकलित हैं। इसके अलावा समकालीन पत्रकारिता के परिदृश्य, उसके विभिन्न आयामों तथा पत्रकारिता की दिशा-दशा तय करने वाले नायकों पर केंद्रित लेख भी इस विशेषांक में शामिल हैं।

सूचना व प्रकाशन विभाग की पत्रिका ‘आजकल’ ने ‘हिंदी पत्रकारिता के दो सौ साल’ शीर्षक से विशेषांक रेमी कुमारी के संपादन में प्रकाशित किया है। जिसमें- सत्य और जनसरोकारों की खोज की यात्रा, हिंदी पत्रकारिता का इतिहास, विकास पत्रकारिता का विकास, अपने पारंपरिक अधिष्ठान पर लौटे मीडिया, हिंदी पत्रकारिता और साहित्य के द्वंद्व, इलेक्ट्रानिक पत्रकारिता को बुनियादी मूल्यों की तरफ लौटना होगा, रेडियो समाचार, विज्ञापन इन दिनों, बाल-पत्रिकाएं लौटा सकती हैं बचपन व रघुवीर सहाय पर केंद्रित लेख आदि रचनाएं शामिल हैं।

मुंबई से भारतीय विद्याभवन द्वारा प्रकाशित मासिक पत्रिका ‘भवन्स नवनीत’ ने विश्वनाथ जी के संपादन में ‘जब तोप मुकाबिल हो...’ शीर्षक से उदंत मार्तंड के दो साल पूरे होने के मौके पर विशेषांक निकाला है। इस विशेषांक में संपादकीय– ‘जब तोप मुकाबिल हो...’, पत्रकारिता अपनी भूमिका भूल चुकी है, विचारों के लिए सिकुड़ती जगह, साहित्यिक पत्रकारिता-सार्थकता के लिए अर्थ से मुठभेड़, आदर्शों में विघटन और मनोबल का ह्रास, वे एक सौ अड़सठ साल, कविता बम-हिंदी प्रदीप व प्रसाद जी के राष्ट्रीय विचार शीर्षक विचारोत्तेजक लेख शामिल हैं। देश के चोटी के साहित्यकारों, पत्रकारों व लेखकों ने वक्त की नब्ज पर हाथ रखा है और भविष्य की दिशा की चर्चा की है।

रिलेटेड पोस्ट्स