उत्तर प्रदेश की दरोगा बिटिया अस्मिता की कहानी उन्हीं की जुबानी

राष्ट्रमंडल खेलों की जूडो स्पर्धा में गोल्ड मेडल जीतने वाली भारत की पहली बेटी

खेलपथ संवाद

लखनऊ। भारतीय जूडो खिलाड़ी अस्मिता डे ने ग्लासगो में आयोजित कॉमनवेल्थ गेम्स 2026 में महिलाओं के 48 किलोग्राम भार वर्ग में स्वर्ण पदक जीतकर इतिहास रच दिया। वह राष्ट्रमंडल खेलों के इतिहास में जूडो खेल में भारत के लिए गोल्ड मेडल जीतने वाली पहली खिलाड़ी बन गईं। अस्मिता का यहां तक पहुंचने और मुश्किलों पर फतह पाने का सफर बेहद भावुक और प्रेरणादायक है।

त्रिपुरा के बेलोनिया की रहने वाली अस्मिता एक बेहद साधारण परिवार से आती हैं। उनके पिता अर्जुन कुमार डे साइकिल ठीक करने का काम करते थे और दिन में मुश्किल से 300-400 रुपये कमा पाते थे। उनका परिवार एक कच्चे (मिट्टी के) घर में रहता था। शुरुआती दिनों में अस्मिता के पास अभ्यास के लिए बुनियादी सुविधाएं भी नहीं थीं और वे फटे हुए गद्दों पर जूडो के दांव-पेच सीखती थीं।

जब उनके पास नेशनल चैम्पियनशिप में जाने के पैसे नहीं थे, तब उनकी मां ने अपने सोने के झुमके गिरवी रखकर उनके खेल का खर्च उठाया था। दिसम्बर 2025 में, कॉमनवेल्थ गेम्स के क्वालिफिकेशन ट्रायल्स से ठीक पहले, उनके पिता का ब्रेन स्ट्रोक के कारण अचानक निधन हो गया। पिता की मौत से अस्मिता पूरी तरह टूट चुकी थीं और उन्होंने खेल छोड़ने का मन बना लिया था

पिता के अंतिम संस्कार के महज 10 दिन बाद उनकी मां और कोच यशपाल सोलंकी ने उन्हें संभाला। उनकी मां ने कहा, "अगर आज तुम रुक गईं, तो तुम्हारे पिता को लगेगा कि मैंने तुम्हारा सपना तोड़ दिया।" इसके बाद वे वापस मैट पर लौटीं।

रनर से जुडोका का सफर: अस्मिता ने अपने करियर की शुरुआत 800 मीटर की दौड़ से की थी। एक जिलास्तरीय ट्रायल के दौरान कोचों ने उनके लचीलेपन और फुर्ती को देखकर उन्हें जूडो खेलने की सलाह दी, जो उनकी जिंदगी का टर्निंग पॉइंट साबित हुआ। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ट्रेनिंग कैंप और विदेशों में खेलने जाने के लिए अस्मिता को भारी कर्ज भी लेना पड़ा था, जिसमें उनके सीनियर्स और कोच ने उनकी मदद की।

यूपी पुलिस की नौकरी से मिला सहारा

गाजियाबाद में दरोगा: साल 2023 में अस्मिता को खेल कोटे से उत्तर प्रदेश पुलिस में कांस्टेबल की नौकरी मिली थी। उनके शानदार प्रदर्शन को देखते हुए मार्च 2026 में उन्हें आउट-ऑफ-टर्न प्रमोशन देकर सब-इस्पेक्टर (दरोगा) बनाया गया। अस्मिता ने अपनी जीत के बाद मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को धन्यवाद देते हुए कहा कि यूपी पुलिस की इस नौकरी ने उन्हें वह आर्थिक स्थिरता दी जिससे वे बिना चिंता के खेल पर ध्यान दे सकीं।

अस्मिता डे की यह ऐतिहासिक जीत साबित करती है कि अगर हौसले बुलंद हों, तो गरीबी, संसाधनों की कमी और जीवन के सबसे बड़े व्यक्तिगत दुखों को हराकर भी दुनिया के शीर्ष पोडियम पर तिरंगा लहराया जा सकता है। अब उनका अगला और अंतिम लक्ष्य ओलम्पिक में भारत के लिए गोल्ड मेडल जीतना है।

केबीसी के एपीसोड में उन्होंने बताया कि मैं त्रिपुरा के एक गांव की रहने वाली हूं। गांव में खर्च नहीं चलता था तो पिता कस्बे में आ गए। वो साइकिल मरम्मत का काम करते थे। कभी पचास रुपए मिल जाते कभी सौ। घर का खर्च चलना मुश्किल था। दो वक्त की रोटी मिलनी मुश्किल लेकिन मुझे जूडो में रुचि थी तो पिता मुझे जूडो के लिए प्रोत्साहित करते थे। घर में खाना न होने पर स्कूल के मिड डे मील का सहारा मिल जाता था।

मां इधर उधर से उधार अनाज ले आती थीं। मैं खेलती गई और राज्य स्तर तक पहुंची कि अचानक पिता चल बसे। नेशनल चैम्पियनशिप में जाना था लेकिन मैंने मना कर दिया। कोच ने समझाया कि पिता का सपना पूरा करना होगा। मैं चली गई और नेशनल चैम्पियनशिप जीती। फिर उत्तर प्रदेश पुलिस में चयन हो गया। कहानी सुनाते हुए इस लड़की की आंखें भर आईं। इतने गरीब परिवार से जब परिवार का मुखिया, एकमात्र सहारा छिन जाए तो उस परेशानी पीड़ा को समझा जा सकता है। जीवन चलता रहता है। जीवन चलता रहना चाहिए।

इस लड़की की बातें सुनकर मन बोझिल हो गया। अब तो खैर सरकार ने इतनी व्यवस्था कर दी है कि कोई खाली पेट न सोए। मुझे मिड डे मील भी जरूरी लगता है। अभी भी जाने कितने बच्चे होंगे जो मिड डे मील जैसा खाना घर पर न खा पाते होंगे। मिड डे मील से पढ़ाई प्रभावित न हो बल्कि यह बच्चों को पढ़ाई के तनाव से दूर रखने में मदद करें। बच्चों को पौष्टिक आहार मिले यह अच्छा है लेकिन हमारे यहां इससे पढ़ाई पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ रहा है। फिलहाल इस लड़की की कहानी प्रेरणादाई लगी। यह असली जेन जी है। जेन जी का अर्थ है ऊर्जा, उत्साह, साहस और कुछ करने की चाहत और हौसला लिए युवा, न कि अराजकता फैलाते काक्रोच। इस लड़की ने घर-परिवार, समाज, सिस्टम से सवाल न किए होंगे बस एक राह चुनी और चल दी। ऐसे बच्चों की कहानियां पढ़ाई और बताई जानी चाहिए। इन्हें केवल सिपाही तक सीमित नहीं किया जाना चाहिए। यह समाज और बच्चों के लिए रोल-मॉडल बननी चाहिए।

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