डच चालों से मात खा गईं भारतीय हॉकी बेटियां

हार का दर्द है, मगर टूर्नामेंट की राह अभी बाकी है

कुन्दन श्रीवास्तव

नई दिल्ली। मेज़बान नीदरलैंड्स के सामने भारतीय महिला टीम ने जूझने का जज़्बा तो दिखाया, मगर खेल की वह धार नहीं दिखा सकी जो दुनिया की सबसे मजबूत हॉकी ताकत को परेशान कर सके। 0-2 की हार इसलिए सिर्फ दो गोल का फासला नहीं है, बल्कि उस दबदबे की कहानी है जिसमें भारत को लगातार अपना रास्ता तलाशना पड़ा और नीदरलैंड्स अपनी शर्तों पर मुकाबला चलाता रहा।

मैच के आंकड़े इस कहानी को और साफ करते हैं। नीदरलैंड्स ने 59.6 प्रतिशत गेंद पर कब्जा रखा, जबकि भारत के पास 40.4 प्रतिशत ही रहा। मेज़बान टीम ने गोल पर 22 शॉट लिए और भारत सिर्फ छह शॉट ही लक्ष्य तक पहुंचा सका। सर्कल एंट्री में भी अंतर बहुत बड़ा रहा—नीदरलैंड्स 35 बार भारतीय सर्कल में पहुंचा, जबकि भारत केवल नौ बार। यानी मुकाबला 0-2 का जरूर रहा, लेकिन मैदान पर दबाव का अंतर इससे कहीं ज्यादा था।

नीदरलैंड्स ने गेंद को अपने कब्जे में रखकर भारत को पीछे धकेला, मिडफील्ड में जगह बनाई और लगातार भारतीय सर्कल के आसपास खतरा पैदा किया। भारत की रक्षापंक्ति ने कई बार संकट टाला, लेकिन लगातार दबाव के बीच आक्रमण के लिए जरूरी ऊर्जा और लय जुटाना मुश्किल होता गया।

पेनल्टी कॉर्नर ने भी दोनों टीमों के बीच अंतर खोल दिया। नीदरलैंड्स को नौ पेनल्टी कॉर्नर मिले और भारत को सिर्फ दो। डच टीम ने इन नौ मौकों में से दो को गोल में बदला, जबकि भारत अपने दोनों पेनल्टी कॉर्नर का फायदा नहीं उठा सका। आंकड़ों में नीदरलैंड्स की पीसी कन्वर्जन 22.2 प्रतिशत और भारत की शून्य रही।

भारत की परेशानी सिर्फ मौकों की कमी नहीं थी, बल्कि उन मौकों तक पहुंचने की कमी भी थी। जब एक टीम 35 बार सर्कल में पहुंचती है और दूसरी सिर्फ नौ बार, तो यह बताता है कि हमले की कहानी किसके पक्ष में लिखी जा रही थी। भारत ने कुछ अच्छे मूव बनाए, लेकिन वे लगातार हमले में नहीं बदल सके। डच डिफेंस के सामने भारतीय फॉरवर्ड लाइन को वह खुली जगह नहीं मिली जिसमें उसकी रफ्तार अपना असर छोड़ सके।

नीदरलैंड्स ने शुरुआत से ही मुकाबले को अपनी लय में रखने की कोशिश की। उसका पासिंग गेम तेज था, मूवमेंट लगातार था और गेंद के बिना खिलाड़ियों की पोजिशनिंग भी भारतीय टीम के लिए चुनौती बनी रही। भारत जब भी गेंद को आगे ले जाने की कोशिश करता, डच खिलाड़ी दबाव बनाकर उसकी रफ्तार तोड़ देते। यही वह डच चाल थी जिसमें भारतीय हॉकी बार-बार उलझती नजर आई।

भारत के लिए एक और चिंता यह रही कि वह विपक्षी सर्कल में पहुंचने के बाद निर्णायक क्षण पैदा नहीं कर सका। छह शॉट ऑन टारगेट और शून्य गोल यह बताते हैं कि अंतिम स्पर्श में वह आत्मविश्वास और सटीकता नहीं थी, जिसकी जरूरत ऐसे बड़े मुकाबले में होती है।

इतिहास भी भारत के पक्ष में नहीं था। उपलब्ध हेड-टु-हेड आंकड़ों में नीदरलैंड्स की 15 जीत के मुकाबले भारत के खाते में सिर्फ दो जीत हैं और दो मैच ड्रॉ रहे हैं। हाल के तीन मुकाबलों में भी डच टीम ने 2-2 के ड्रॉ के बाद भारत को 4-2 और 1-0 से हराया था। आज की 2-0 जीत ने इस दबदबे को और गहरा कर दिया। लेकिन विश्व कप में हर हार के बाद एक अगला सवाल खड़ा होता है और भारतीय टीम के सामने भी अब वही सवाल है- क्या वह इस शिकस्त को अगले मुकाबले की ताकत बना पाएगी?

पूल ई की तस्वीर फिलहाल भारत के लिए मुश्किल है। नीदरलैंड्स दो मैचों में दो जीत के साथ छह अंक लेकर शीर्ष पर है। चीन के दो अंक हैं, जबकि ऑस्ट्रेलिया और भारत के खाते में एक-एक अंक है। भारत का गोल अंतर -2 है। इसलिए अब आगे का मुकाबला भारतीय टीम के लिए सिर्फ एक और मैच नहीं है। उसे अपने खेल में वह आक्रामकता लानी होगी जो आज दिखाई नहीं दी। मिडफील्ड को गेंद पर ज्यादा देर टिकना होगा, फॉरवर्ड लाइन को ज्यादा सर्कल एंट्री बनानी होंगी और पेनल्टी कॉर्नर को गोल में बदलने की कला दिखानी होगी।

नीदरलैंड्स ने आज भारत को सिर्फ हराया नहीं, बल्कि यह भी बताया कि विश्वस्तरीय हॉकी में दबाव को झेलना और दबाव को वापस विपक्षी टीम पर डालना- दोनों अलग-अलग चीजें हैं। भारत ने पहला काम कुछ हद तक किया, मगर दूसरे में वह पीछे रह गया। फिर भी यह वह वक्त नहीं जब भारतीय टीम अपने भीतर की रोशनी बुझने दे। हार का दर्द है, मगर टूर्नामेंट की राह अभी बाकी है। अब जरूरत है इस दर्द को ग़ुस्से में नहीं, खेल की धार में बदलने की। आज डच चालों में भारतीय हॉकी उलझी रही। अगली चुनौती में उसे इन उलझनों से निकलकर अपनी चाल चलनी होगी। क्योंकि विश्व कप में बड़े सपने सिर्फ बड़े नामों से नहीं, बड़े मुकाबलों में बड़े जवाब देने से पूरे होते हैं।

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