यूनेस्को की विश्व धरोहर बने झांसी का हीरोज ग्राउंड
मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के निर्देशों पर नहीं हुआ अमल
अविनाश भटनागर की कलम से
झांसी। कालजयी दद्दा ध्यानचंद और रूप सिंह का पौरुष मंच झांसी का हीरोज ग्राउंड यूनेस्को की विश्व धरोहर बने इसकी मांग हॉकी खिलाड़ियों ने उठाई है। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ अशोक ध्यानचंद और उनके परिजनों की मांग को मानते हुए खेल निदेशक राम प्रकाश सिंह को हीरोज मैदान में कृत्रिम घास लगाने के निर्देश दे चुके हैं लेकिन, काम का श्रीगणेश भी नहीं हुआ है। देखा जाए तो भारत के 45 स्थल अभी तक विश्व धरोहर हैं, इसमें 46वां नाम हीरोज ग्राउंड का भी हो, इसकी मांग यूनेस्को से भारत के सभी हॉकी खिलाड़ियों और हॉकीप्रेमियों ने की है।
जब सरकार हॉकी के जादूगर की साधना स्थली पर ध्यान नहीं दे रही, ऐसे में झांसी के हीरोज ग्राउंड को यूनेस्को द्वारा विश्व धरोहर स्थल के रूप में स्थापित करना अच्छी पहल होगी। हीरोज ग्राउंड जैसा कि नाम से ही स्पष्ट है इस मैदान ने दुनिया को हॉकी का जादूगर दिया। मेजर ध्यानचंद ने हॉकी की चमक से भारत का नाम दुनिया में गौरवान्वित किया। दुनिया भर में फुटबॉल में जो स्थान पेले और क्रिकेट में डॉन ब्रैडमैन का है वही स्थान हॉकी में मेजर ध्यानचंद का है।
हीरोज क्लब की स्थापना 1921 में झांसी में हुई थी और मेजर ध्यानचंद इस क्लब से जुड़े और यहीं नियमित अभ्यास करते थे, यह मैदान उनके प्रारम्भिक हॉकी जीवन की कर्मस्थली माना जाता है। इस मैदान पर उन्होंने अपने खेल को निखारा और बाद में नवोदित खिलाड़ियों को इसी मैदान पर हॉकी की बारीकियां सिखाईं। दद्दा ध्यानचंद के भाई रूप सिंह भी हीरोज क्लब से जुड़े हुए थे।
इसी हीरोज ग्राउंड पर हॉकी की साधना कर मेजर ध्यानचंद और कैप्टन रूप सिंह दोनों ने भारतीय हॉकी की पताका पूरी दुनिया में फहराई, आज यह हीरोज ग्राउंड अपनी पहचान को कायम रखने के लिए उत्तर प्रदेश सरकार की ओर देख रहा है। अभी तक तो इस ऐतिहासिक मैदान पर आधुनिक एस्ट्रोटर्फ का शानदार मैदान होना चाहिए था परंतु इसे हॉकी का दुर्भाग्य ही कहेंगे कि सरकार ने अभी तक ध्यान नहीं दिया।
हीरोज ग्राउंड पर आधुनिक एस्ट्रोटर्फ लगाए जाने को लेकर मेजर ध्यानचंद के पुत्र और 1975 विश्व विजेता भारतीय हॉकी टीम के सदस्य अशोक ध्यानचंद एवं परिवार के अन्य लोग भी उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ जी से मिले थे। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने इस ऐतिहासिक मैदान पर एस्ट्रोटर्फ लगाए जाने के निर्देश उत्तर प्रदेश के खेल निदेशक आर.पी. सिंह (अंतरराष्ट्रीय हॉकी खिलाड़ी) को दिए थे परंतु आज तक इस दिशा में कोई काम नहीं हो सका।
हीरोज ग्राउंड हॉकी का मैदान ही नहीं यह मेजर ध्यानचंद की हॉकी की साधना और प्रशिक्षण तथा उनकी अंतिम स्मृति से जुड़ा ऐतिहासिक स्थल है। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि 3 दिसम्बर 1979 को मेजर ध्यानचंद के निधन के पश्चात उनका अंतिम संस्कार इसी हीरोज ग्राउंड में किया गया था, मैदान के एक हिस्से में मेजर ध्यानचंद की समाधि भी स्थित है।
2021 में हीरोज क्लब की स्थापना के 100 वर्ष पूर्ण हुए हैं। यह केवल एक मैदान नहीं है, यह गुरु शिष्य परम्परा का प्रतीक भी है। जिस मैदान पर उन्होंने हॉकी सीखी, जिस मैदान पर अपने सपनों को आकार दिया, जिस मैदान पर उन्होंने खिलाड़ियों को प्रशिक्षण दिया। इस मैदान की मिट्टी में उनकी अंतिम स्मृति भी बस गई। इससे बड़ा किसी खिलाड़ी और उसके मैदान के बीच संबंध क्या हो सकता है?
हीरोज ग्राउंड की मिट्टी को नमन, मेजर ध्यानचंद की साधना स्थली को नमन, मेजर ध्यानचंद को नमन, भारतीय हॉकी की गौरवशाली परम्परा को नमन। आओ हम यह संकल्प लें, हॉकी को आगे बढ़ाएंगे, नए खिलाड़ियों को तैयार करेंगे, दद्दा ध्यानचंद की विरासत को आगे ले जाएंगे, और भारत को फिर से विश्व हॉकी का सिरमौर बनाएंगे। (लेखक- अविनाश भटनागर एनआईएस हॉकी प्रशिक्षक खेल एवं युवा कल्याण विभाग ग्वालियर)
