बच्चे मैदान ढूंढ़ रहे, व्यवस्था बहाने
देश खेल महाशक्ति बनने की दौड़ में है। सरकारें दौड़ रही हैं, मंत्रालय दौड़ रहे हैं, योजनाएं दौड़ रही हैं, विज्ञापन दौड़ रहे हैं और सबसे तेज दौड़ रही हैं सरकारी घोषणाएं। बस एक चीज है जो कई विद्यालयों में दौड़ नहीं पा रही वो है बच्चों की खेल प्रतिभा। उसके सामने सबसे पहली बाधा मैदान हैं। अगर मैदान मिल भी गया तो दूसरा सवाल-खिलाएगा कौन?
शारीरिक शिक्षा शिक्षक की नियुक्ति होगी तो बच्चा मैदान में जाएगा। शिक्षक नहीं होगा तो खेल का पीरियड भी शायद किसी दूसरी कक्षा का काम पूरा करने में निकल जाएगा। फिर हम बड़े गर्व से कहेंगे- भारत फिट हो रहा है। कागज पर हर बच्चा खिलाड़ी है। हमारी व्यवस्था की खूबसूरती देखिए। नीतियों में खेलों को महत्व है। भाषणों में शारीरिक शिक्षा का महत्व है। अभियानों में फिटनेस है। कार्यक्रमों में योग है। समारोहों में खेल हैं। फोटो में बच्चे मैदान में हैं। लेकिन कई स्कूलों की वास्तविकता पूछिए तो कहानी कुछ और है।
शारीरिक शिक्षा शिक्षक कहां हैं? “पद स्वीकृत होने की प्रक्रिया में हैं।” “भर्ती शीघ्र होगी।” “प्रस्ताव शासन को भेज दिया गया है।” “विचार चल रहा है।” अर्थात बच्चा बड़ा हो जाए, विद्यालय छोड़ दे, नौकरी की तैयारी शुरू कर दे-लेकिन शिक्षक की भर्ती की प्रक्रिया अभी भी विचाराधीन रह सकती है। यह देश की शारीरिक शिक्षा व्यवस्था का सबसे बड़ा दुर्भाग्य नहीं तो और क्या है?
खेल का पीरियड- सबसे आसान शिकार। विद्यालय में गणित का पीरियड रद्द कर दीजिए तो सवाल उठेंगे। विज्ञान की कक्षा नहीं लगे तो शिकायत होगी। अंग्रेजी की कक्षा छूट जाए तो अभिभावक नाराज होंगे। लेकिन खेल का पीरियड? “आज रहने दो।” कभी परीक्षा की तैयारी के नाम पर, कभी दूसरे कार्यक्रम के नाम पर और कभी शिक्षक की अनुपस्थिति के कारण। बच्चा चुपचाप वापस कक्षा में चला जाता है। हम भूल जाते हैं कि जिस बच्चे को हम घंटों बैठाकर पढ़ा रहे हैं, उसके शरीर को भी उतने ही अधिकार से चलने, दौड़ने और खेलने की जरूरत है।
फिट इंडिया, लेकिन फिटनेस की जिम्मेदारी किसकी? देश में फिटनेस के अभियान चल रहे हैं। अच्छी बात है। लेकिन फिटनेस कोई एक दिन का आयोजन नहीं है। फिटनेस फोटो खिंचवाने से नहीं आती। फिटनेस है- नियमित खेल, नियमित व्यायाम और स्वस्थ जीवनशैली। अगर विद्यालय में प्रशिक्षित शारीरिक शिक्षा शिक्षक ही नहीं है, तो बच्चों तक वैज्ञानिक और नियमित शारीरिक शिक्षा कैसे पहुंचेगी?
सवाल असुविधाजनक है, इसलिए शायद पूछा कम जाता है। योग दिवस आया, योग चला गया। 21 जून को योग दिवस पर स्कूलों में शानदार आयोजन होते हैं। बच्चे योग करते हैं, तस्वीरें खिंचती हैं, समाचार बनते हैं और संदेश जारी होते हैं। लेकिन सवाल यह है कि अगले दिन क्या? क्या योग बच्चों की दिनचर्या में शामिल हुआ? क्या विद्यालय में नियमित प्रशिक्षित योग शिक्षक है? क्या बच्चों को योग का सही और सुरक्षित अभ्यास लगातार कराया जा रहा है? अगर जवाब नहीं है, तो फिर हमें स्वीकार करना होगा कि हमने योग को जीवनशैली से निकालकर आयोजन बना दिया है।
ओलम्पिक पदक की चिंता, प्राथमिक खेल शिक्षा की नहीं। हम चाहते हैं कि भारत ओलम्पिक में अधिक पदक जीते। हम चाहते हैं कि विश्वस्तरीय खिलाड़ी निकलें। हम चाहते हैं कि गांवों और कस्बों से प्रतिभाएं सामने आएं। लेकिन प्रतिभा खोजने की पहली सीढ़ी तो विद्यालय है। वहीं बच्चे पहली बार दौड़ते हैं, कूदते हैं, गेंद फेंकते हैं, कबड्डी खेलते हैं, कुश्ती लड़ते हैं और अपनी क्षमता पहचानते हैं। यदि उसी स्तर पर व्यवस्था कमजोर होगी तो आगे की मंजिल पर प्रतिभाएं कहां से पहुंचेंगी?
ओलम्पिक पदक की इमारत की नींव स्कूल के मैदान में पड़ती है। नींव कमजोर रखकर मजबूत इमारत का सपना देखना अपने आप में एक खेल है- और इस खेल में खिलाड़ी नहीं, व्यवस्था जीतती है। शारीरिक शिक्षा को ‘दूसरे दर्जे’ से बाहर निकालिए। इसके लिए सबसे पहले मानसिकता बदलनी होगी। शारीरिक शिक्षा कोई मनोरंजन नहीं। खेल कोई समय काटने का साधन नहीं। योग कोई सालाना कार्यक्रम नहीं। मैदान कोई खाली पड़ी जमीन नहीं। ये शिक्षा के अभिन्न अंग हैं। बच्चे का शरीर स्वस्थ होगा तो उसका मन भी बेहतर ढंग से सीख सकेगा।
अनुशासन, नेतृत्व, टीम-भावना, आत्मविश्वास, संघर्ष और हार-जीत को स्वीकार करने की क्षमता- खेल इन सबका विद्यालय है। फिर भी शारीरिक शिक्षा को आज भी कई जगह वह सम्मान क्यों नहीं मिलता जिसका वह अधिकार रखती है? अब फाइल नहीं, मैदान दौड़ना चाहिए। देश को अब घोषणाओं से आगे बढ़ना होगा। हर विद्यालय में प्रशिक्षित शारीरिक शिक्षा शिक्षक की उपलब्धता सुनिश्चित करनी होगी। जहां जरूरत हो वहां खेल मैदान विकसित करने होंगे। योग को नियमित शिक्षा से जोड़ना होगा। बच्चों के लिए खेल का समय सुरक्षित करना होगा। और सबसे महत्वपूर्ण- शारीरिक शिक्षा को शिक्षा व्यवस्था की मुख्यधारा में वास्तविक स्थान देना होगा। क्योंकि अगर हम आज बच्चों को मैदान नहीं देंगे तो कल अस्पतालों पर बोझ बढ़ेगा। अगर आज हम उन्हें खेल नहीं देंगे तो कल जीवनशैली से जुड़ी समस्याओं से लड़ने में अधिक संसाधन लगाने पड़ेंगे।
सरकार स्वस्थ भारत चाहती है। देश खेल महाशक्ति बनना चाहता है। माता-पिता स्वस्थ बच्चे चाहते हैं। बच्चे खेलना चाहते हैं। तो फिर बाधा कहां है? बाधा मैदान की कमी है या सोच की? बाधा बजट की कमी है या प्राथमिकता की? बाधा शिक्षक की कमी है या इच्छाशक्ति की? इन सवालों के जवाब अब भाषणों से नहीं, मैदान पर दिखाई देने चाहिए। क्योंकि- बच्चों को फिटनेस का पाठ पढ़ाने से पहले उन्हें मैदान देना होगा। खेल महाशक्ति बनने से पहले स्कूल को खेलमय बनाना होगा। और सबसे बड़ा सच यह है- फाइलें चाहे जितनी तेज दौड़ें, देश के बच्चे तभी आगे बढ़ेंगे जब वे मैदान में दौड़ेंगे। स्वस्थ राष्ट्र की शुरुआत संसद के भाषण से नहीं, विद्यालय के मैदान से होती है।
(खेलपथ का शब्द-सहयात्री)
