मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के राज में खेलों के भेड़िये बेखौफ

यूपी में खेल अधिकारियों को नहीं झुलसाती जांच की आंच

समझ से परे है खेल मंत्री गिरीश चंद्र यादव की चुप्पी

श्रीप्रकाश शुक्ला

लखनऊ। उत्तर प्रदेश के गुंडा-मवालियों की जहां मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के नाम से पतलून गीली हो जाती है वहीं निदेशालय खेल से जुड़े नौकरशाहों को नियम-कायदे तोड़ने के बाद भी डर नहीं लगता। निदेशालय खेल को अमूमन हर साल महिलाओं पर हुए कदाचार के साथ सरकारी धन के वारे-न्यारे होने की शिकायतें मिलीं, इसके लिए जांच समितियां भी बनीं लेकिन जांच की आंच से कोई खेलनहार आज तक नहीं झुलसा।

देश में उत्तर प्रदेश पहला ऐसा राज है जिसके खेल विभाग की बागडोर दो बड़े खिलाड़ियों के हाथ है। लोगों का मानना है कि खेल, खिलाड़ी और प्रशिक्षक का मर्म और धर्म सिर्फ एक खिलाड़ी जान सकता है लेकिन यूपी में दो खिलाड़ी नौकरशाहों के हाथ विभाग की बागडोर होने के बावजूद खिलाड़ी बेटियां खून के आंसू रो रही हैं। ताज नगरी आगरा में एक महिला कबड्डी प्रशिक्षक भी फिलवक्त मानसिक प्रताड़ना से आहत निदेशालय खेल से इंसाफ की बाट जोह रही है।

गोरखपुर की इस महिला प्रशिक्षक को मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ बेटी की तरह मानते हैं। खेल निदेशालय लखनऊ को अपने ही अधिकारी की कारगुजारियों का राजफाश करने के बाद यह बेटी फिलवक्त घुट-घुट कर जी रही है। उसे धमकाया जा रहा है, मुंह न खोलने की हिदायत दी जा रही है। खेल अधिकारियों की काली करतूतों का उत्तर प्रदेश में यह पहला मामला नहीं है, इससे पहले भी दर्जनों बेटियां विभाग के भेड़ियों का शिकार हुई हैं। जब भी कोई ऐसा मामला आता है, जांच समितियां बना दी जाती हैं। लेकिन इन जांच समितियों में प्रायः उन्हें ही रखा जाता है, जोकि खुद दागी या बागी होते हैं। यही वजह है कि आज तक किसी बेटी को इंसाफ नहीं मिला तो विभाग का खजाना खाली करने वाले भी दूध के धुले साबित हो गए।

खेल निदेशालय उत्तर प्रदेश अपने अधिकारियों की कारगुजारियों पर पर्दा क्यों डालता है, यब बात भी किसी से छिपी नहीं है। पाठकों को जानकर आश्चर्य होगा कि खेल विभाग के कई अधिकारियों पर दोष सिद्ध होने के बाद भी उन्हें बचाया गया। फिलवक्त विभाग से विदा हो चुका एक ऩटवरलाल अमानत में खयानत के चलते अभी अपनी पेंशन से वंचित है। सच कहें तो खेल निदेशालय उत्तर प्रदेश दागियों और बागियों की शरणगाह बन चुका है। एक अधिकारी तो मुख्यमंत्री के साथ अपनी नजदीकियों का बेजा लाभ उठा रहा है।

वैसे लखनऊ कई खेल अधिकारियों के लिए खेलोत्थान नहीं स्वयं के उत्थान की राजधानी बन चुकी है। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ प्रदेश में खेलों की जमीनी हकीकत से दूर हैं। खेल मंत्री गिरीश चंद्र यादव योगी जी को सच्चाई से अवगत करा सकते हैं लेकिन उनकी चुप्पी भी किसी बड़े गड़बड़झाले का संकेत देती है। खेल मंत्री द्वारा बेलगाम अधिकारियों पर अंकुश न लगाने के कारण ही आज प्रदेश के खेल छात्रावास यहां तक कि स्पोर्ट्स कॉलेज भी कमीशनखोरी का केन्द्र बन गए हैं। खिलाड़ियों को जहां अच्छी डाइट नहीं मिलती वहीं अन्य सुविधाएं अधिकारियों के हाथ का कठपुतली बन चुकी हैं।                

 

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