दुनिया का नूर, भारत का कोहिनूर तीरंदाज पायल
ओडिशा की तीरंदाज बेटी ने अपनी आदर्श को हराकर रचा इतिहास
दोनों हाथ-पैर नहीं फिर भी बैंकॉक वर्ल्ड पैरा आर्चरी में जीता गोल्ड
खेलपथ संवाद
नई दिल्ली। कहते हैं कि हौसले बुलंद हों तो तकदीर को भी झुकना पड़ता है। ओडिशा के एक दिहाड़ी मजदूर की बेटी पायल नाग की कहानी इसका जीवंत प्रमाण है। मात्र आठ साल की उम्र में एक दर्दनाक बिजली हादसे में पायल ने अपने दोनों हाथ और दोनों पैर गंवा दिए थे। जिस उम्र में बच्चे खेलना सीखते हैं, उस उम्र में पायल के पास जीवन जीने का सहारा तक नहीं था। लेकिन कुदरत ने उनसे अंग छीने थे, उनकी रूह की ताकत नहीं। आज यह बेटी दुनिया का नूर तो भारत का कोहिनूर है।
ओडिशा की पायल नाग ने जिस तरह अपनी शारीरिक अक्षमताओं को मात देकर विश्व मंच पर तिरंगा लहराया है, वह हर किसी के रोंगटे खड़े कर देने वाला है। पायल की प्रतिभा को पहली बार उनके पेंटिंग्स के जरिए पहचाना गया। विश्व प्रसिद्ध कोच कुलदीप वेदवान, जिन्होंने दुनिया को शीतल देवी जैसी चैम्पियन दी, उन्होंने पायल के भीतर छिपे एक तीरंदाज को देखा। बिना हाथों के पैर और मुंह के सहारे तीर चलाने की कला विकसित करना नामुमकिन जैसा था, लेकिन कोच कुलदीप और पायल के कड़े अभ्यास ने इसे सम्भव कर दिखाया।
हाल ही में बैंकॉक में आयोजित वर्ल्ड पैरा आर्चरी सीरीज फाइनल में पायल ने वो कर दिखाया जिसकी किसी ने कल्पना नहीं की थी। उन्होंने फाइनल मुकाबले में अपनी ही आदर्श और विश्व चैम्पियन शीतल देवी को हराकर स्वर्ण पदक अपने नाम किया। यह जीत केवल एक पदक की नहीं, बल्कि उस संघर्ष की जीत थी जो पायल ने पिछले कई सालों से खुद से लड़ा था। सच कहें तो हर भारतीय के लिए शीतल और पायल जैसी बेटियां नजीर हैं। जब भी मैं खुद को कमजोर या दुखी महसूस करूंगा। मैं पायल और शीतल की इन तस्वीरों को देखूंगा और खुद को याद दिलाऊंगा कि साहस, लचीलापन और सकारात्मक सोच का असली मतलब क्या होता है।'
