महिला सशक्तीकरण के दावे कब बनेंगे हकीकत

ग्रामीण क्षेत्र की हर चौथी, शहरी क्षेत्र की हर छठी महिला हिंसा का शिकार

खेलपथ संवाद

नई दिल्ली। यूं तो भारतीय समाज में महिलाओं को सशक्त बनाने के तमाम दावे गाहे-बगाहे किए ही जाते हैं। आधी दुनिया को पूरा हक देने की बात होती है। किंतु-परंतु के बीच उन्हें जनप्रतिनिधि संस्थाओं में 33 फीसदी आरक्षण देने पर प्रतिबद्धता जतायी जाती है। लेकिन इन दावों के बीच सामने आया एक कड़वा सच हमें वास्तविक स्थिति से रूबरू करा देता है।

राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण-6 की रिपोर्ट के आंकड़े बताते हैं कि देश में ग्रामीण इलाकों में हर चौथी और शहरी क्षेत्र में हर छठी महिला किसी न किसी रूप में हिंसा का शिकार होती रही है। यह विडम्बना ही है कि शहरों की तुलना में ज्यादा शांत व सुरक्षित माने जाने वाले ग्रामीण इलाकों में स्त्रियों को घरेलू एवं यौन हिंसा का ज्यादा सामना करना पड़ता है। गुरुवार को सुप्रीम कोर्ट ने गृहिणियों के योगदान को राष्ट्र के उत्थान में महत्वपूर्ण बताते हुए उन्हें नेशन बिल्डर तक कह दिया।

यहां तक कि घर और परिवार की देखभाल में गृहिणियों द्वारा किए जाने वाले कार्यों के कल्पित आर्थिक मूल्य का निर्धारण करते हुए उसे नजरअंदाज न करने की सलाह दी। यह विडम्बना ही है कि जिन महिलाओं को सुप्रीम कोर्ट नेशन बिल्डर बता रहा है, उन्हें हम सुरक्षा नहीं दे पा रहे हैं। आखिर महिला सशक्तीकरण के सारे विशेष प्रयास सिर्फ कागजों तक ही क्यों सिमट जाते हैं? आखिर क्या वजह है कि महिलाओं की रक्षा-सुरक्षा हेतु तमाम विशेष कानून बनाये जाने के बावजूद जमीनी हकीकत नहीं बदलती है।

इसमें दो राय नहीं कि समय-समय पर महिला उत्थान के लिये तमाम महत्वपूर्ण योजनाएं और अभियान चलाये जाते रहे हैं। इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता है कि विकासात्मक कार्यों में महिलाओं की भागीदारी बढ़ी है। जीवन के हर क्षेत्र में वे अपना आकाश तलाश रही हैं। विधायिका में 33 प्रतिशत आरक्षण देने के मुद्दे पर सभी राजनीतिक दल सहमत नजर आते हैं। सवाल यही है कि जीवन व्यवहार में स्थिति क्यों नहीं बदलती।

देश के नीति-नियंताओं को इस गंभीर मुद्दे पर विचार करना होगा कि महिलाओं की सुरक्षा के लिये तमाम विशेष कानून बनाये जाने के बावजूद क्यों ग्रामीण क्षेत्रों में हर चौथी व शहरी क्षेत्र में हर छठी स्त्री को हिंसा व यौन उत्पीड़न का शिकार होना पड़ रहा है। आखिर क्या वजह है कि घर से लेकर बाहर तक वे खुद को सुरक्षित नहीं महसूस कर पा रही हैं? क्या कहीं इसमें पितृसत्ता प्रधान समाज की मानसिकता कारण है?

दरअसल, आज लड़कियों व महिलाओं के खिलाफ हिंसा कई रूपों में मौजूद है। आजादी के सात दशक बाद भी हम दहेज के कलंक से मुक्त नहीं हो पाये हैं। हाल के दिनों में दहेज हत्या के कई बहुचर्चित मामले प्रकाश में आए। एक लड़की की पढ़ाई से लेकर शादी तक मां-बाप काफी खर्च करते हैं, फिर दहेज देने की जरूरत क्यों? छोटी-छोटी बातों में महिलाओं से मारपीट की खबरें आती हैं। वहीं अदिवासी व पिछड़े इलाकों में महिलाओं को डायन बताकर मारने की घटनाएं सामने आती हैं। हमारा समाज आज भी अंधविश्वासों और जादू-टोने के भय से मुक्त नहीं हुआ है। जिसके चलते महिलाओं के खिलाफ हिंसा के मामले सामने आते हैं। सर्वेक्षण का यह तथ्य चौंकाता है कि 18 से 49 आयु वर्ग की विवाहिताओं में 22 फीसदी को वैवाहिक जीवन में घरेलू हिंसा का शिकार होना पड़ा है। हालांकि, समय के साथ हिंसा के आंकड़ों में गिरावट आई है, लेकिन ‍इसके बावजूद स्थिति चिंता पैदा करती है। जो किसी सभ्य समाज के माथे पर एक दाग की तरह ही है।

हमारी व्यवस्था की विसंगतियां, पुरुष प्रधान सोच और हिंसा रोकने के लिये बनाए गए कानूनों के क्रियान्वयन में खामियां महिलाओं को पर्याप्त सुरक्षा उपलब्ध कराने में बाधक हैं। जो सामाजिक विसंगति की ओर इशारा करता है। यदि समय रहते कानून प्रवर्तन एजेंसियां संवेदनशील ढंग से कदम उठायें तो महिलाएं खुद को घर-बाहर सुरक्षित महसूस कर सकती हैं। ग्रामीण क्षेत्रों में किशोर अवस्था के दौरान यौन-हिंसा का शिकार होने का प्रतिशत शहरों के मुकाबले अधिक होना, ग्रामीण समाज में विद्रूपताओं को दर्शाता है। जरूरी है कि ग्रामीण समाज में महिलाओं को अपने अधिकारों के प्रति सजग किया जाए।

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