पवित्र उद्देश्य और समाज के सहयोग से आगे बढ़ती हैं अच्छी संस्थाएं
वनखंडेश्वर विद्यापीठ धनसुला में आयोजित हुई चिंतन बैठक
देशभर से आये विद्वानों ने ऐतिहासिक संस्थान को बचाने के सुझाए उपाय
खेलपथ संवाद
मुरैना। धनसुला के वनखंडेश्वर विद्यापीठ में आयोजित चिन्तन बैठक में देश भर से आये विशिष्ट लोगों ने कहा है कि लम्बे समय तक आदर्श रहीं शैक्षणिक संस्थाओं के संचालक खुले मन से संवाद करके यदि अविश्वास की खाई को पाटेंगे तभी संस्थाएं अपने खोये हुए गौरव को वापस पा सकती हैं। समाज का भी दायित्व है कि ऐसी संस्थाओं को संरक्षण देने आगे आए।
संस्थाओं को रचनात्मक गतिविधियों पर ध्यान देना चाहिए। पवित्र उद्देश्य के साथ की गई पहल का सभी को साथ देना चाहिए। किसी भी विद्यापीठ को अपनी विशिष्ट पहचान कायम करने के साथ अपनी ऐतिहासिक यात्रा को भी दस्तावेजों के माध्यम से सहेजना चाहिए और समय समय पर प्रदर्शित करना चाहिए। प्रसिद्ध शिक्षाविद प्रोफ़ेसर रामसिंह तोमर द्वारा स्थापित पोरसा तहसील के धनसुला में 36 साल पहले स्थापित वनखंडेश्वर विद्यापीठ में गत रविवार को ' चिंतन बैठक' आदर्श शिक्षण संस्थाओं के संरक्षण और देश की शिक्षा व्यवस्था को बेहतर करने पर केन्द्रित थी।
इस अवसर पर विद्यापीठ नये घंटे का उद्घाटन हुआ। बहुत से विशिष्ट जनों ने वनखंडेश्वर विद्यापीठ धनसुला के लिए सहयोग का हाथ बढ़ाया। सुप्रसिद्ध चिंतक रघु ठाकुर, अंतरराष्ट्रीय ख्याति के मूर्तिकार राबिन डेविड, पत्रकार डॉ सुरेश सम्राट, इतिहासवेत्ता डॉ सफ़िया खान, शिक्षाविद दीनदयाल शर्मा, कलाविद सुमन सिंह, खेल-पत्रकार श्रीप्रकाश शुक्ल, कवि देवेन्द्र तोमर, सामाजिक कार्यकर्ता, देवेन्द्र भदौरिया, सुरेन्द्र सिंह तोमर, एडवोकेट शम्भूदयाल बघेल, इतिहासविद् डॉ. अजय अग्निहोत्री, फिल्म-निर्माता शशांक डंडोतिया, पुस्तकालय-विज्ञान की विशेषज्ञ डॉ. शिवा श्रीवास्तव, विधि विशेषज्ञ अंकुर समाधिया, शिक्षा क्षेत्र में कार्यरत डॉ. मनोज भटेले को इस चिंतन बैठक में विशेष रूप से आमंत्रित किया गया था।
वनखंडेश्वर विद्यापीठ के शुभचिंतकों द्वारा आयोजित इस बैठक में रघु ठाकुर ने कहा कि शिक्षा की दुकानों को सरकार जब बंद करेगी तभी आदर्श शिक्षण संस्थाएं पनपेंगी। अच्छी शिक्षण संस्थाओं के संचालकों में परस्पर सद्भाव के साथ असहमति का सम्मान भी जरूरी है। प्रसिद्ध मूर्तिकार राबिन डेविड ने बताया कि संस्थाओं का पैसा वेतन पर ही खर्च हो जाता है। गतिविधियों के लिए पैसा बचता ही नहीं। ऐसी स्थिति में मदद करने वाली संस्थाओं और व्यक्तियों की पहचान जरूरी है।
पत्रकार डॉ. सुरेश सम्राट ने कहा कि संस्थाएं जिस उद्देश्य के लिए बनी हैं उससे हटके उनका उपयोग हो नहीं सकता। अच्छी संस्थाओं को बचाने में जो लोग जुटे हैं उनके साथ हिम्मत से खड़े होना जरूरी है। इतिहासविद डॉ. साफ़िया खान ने शिक्षण संस्थाओं को सांस्कृतिक वैचारिक गतिविधियों के केन्द्र के रूप में विकसित करने और स्मृति अभिभाषण आदि आयोजित करने और पत्रिकाएं निकालने की जरूरत बताई। डॉ. शिवा श्रीवास्तव ने अच्छे संस्थानों को चलाने में प्रतिबद्धता, साहस और लगन के महत्व को रेखांकित किया।
सामाजिक कार्यकर्ता देवेन्द्र भदौरिया ने कहा कि संस्थाएं निजी सम्पत्ति नहीं होतीं। उन्होंने विस्तार से बताया कि संस्थाओं के हर प्रकार की संस्थागत मदद तभी मिलती हैं जब वे लोकतंत्र, पारदर्शिता और समावेशी संस्कृति के साथ अपने विधान का पालन करते हुए काम करती हैं।
एडवोकेट शम्भूदयाल बघेल ने संस्थाओं में संरक्षक मंडल बनाकर गुणीजनों को जोड़ने की जरूरत बताते हुए कहा कि संस्था संचालकों के मन में पाप नहीं हो तो संस्थाएं अच्छे से चलती हैं। फिल्मकार शशांक डंडोतिया ने वनखंडेश्वर विद्यापीठ और उसके संस्थापक प्रोफ़ेसर रामसिंह तोमर पर केन्द्रित वृत्तचित्र बनाने की प्रतिबद्धता दर्शाई। विधि विशेषज्ञ अंकुर समाधिया ने कहा कि अच्छे संस्थान अपने विद्यार्थियों को दृष्टि देते हैं।
सामाजिक कार्यकर्ता सुरेन्द्र सिंह तोमर और श्याम सिंह तोमर ने अच्छे कामों की सराहना की जरूरत बताते हुए कहा कि वनखंडेश्वर विद्यापीठ धनसुला को समाज से जो सहयोग मिलना चाहिए था वह अब तक मिला नहीं। शिक्षा के क्षेत्र में कार्यरत डॉ. मनोज भटेले ने किसी भी संस्था के विकास में मुखिया के महत्त्व पर बल दिया।
खेल पत्रकार श्रीप्रकाश शुक्ल ने कहा कि वनखंडेश्वर विद्यापीठ धनसुला जैसी संस्थाएं राष्ट्र की अमूल्य धरोहर हैं जो हम सबकी अकर्मण्यता के कारण अपना समुचित विकास नहीं कर पातीं। चिंतन बैठक को पूर्व प्राचार्य आरपी शर्मा, कृष्णनगर शिक्षा प्रसार समिति के सचिव रामहरि सिंह, अध्यापक चंद्रकांत तोमर, जनपद पंचायत अम्बाह की अध्यक्ष मधुरिमा तोमर ने भी सम्बोधित किया।
कार्यक्रम का संचालन करते हुए पत्रकार एवं सामाजिक कार्यकर्ता जयन्त सिंह तोमर ने कहा कि महात्मा गांधी और डॉ. राममनोहर लोहिया जैसे नायकों ने अपनी पहल से देश और संस्थाओं को बनाया। हर समुदाय को इसी तरह अपनी संस्थाओं को बचाना जरूरी है। धन्यवाद ज्ञापन प्राचार्य मुनेन्द्र सेंगर ने किया।
