भारतीय पैरा बैडमिंटन में रैंकिंग से बड़ी हो गई चयन की दीवार?
प्रेमा विश्वास का दर्द, खेल व्यवस्था की संवेदनशीलता का सवाल
श्रीप्रकाश शुक्ला
ग्वालियर। किसी खिलाड़ी के लिए देश का प्रतिनिधित्व करने का सपना सिर्फ एक पदक का सपना नहीं होता। उसके पीछे वर्षों की तपस्या, अभावों से संघर्ष, परिवार का त्याग और हर दिन अपने आपको बेहतर बनाने की जिद होती है। खासकर पैरा खिलाड़ी जब अंतरराष्ट्रीय स्तर तक पहुंचता है तो उसकी उपलब्धि के पीछे संघर्ष की एक लम्बी कहानी होती है। ऐसे में जब कोई खिलाड़ी बेहतर रैंकिंग और प्रदर्शन के बावजूद किसी बड़ी अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिता की टीम में जगह नहीं बना पाता, तो सवाल स्वाभाविक रूप से उठता है- आखिर चयन का आधार क्या था?
उत्तराखंड की अंतरराष्ट्रीय पैरा बैडमिंटन खिलाड़ी प्रेमा विश्वास का मामला आज इसी सवाल को सामने ला रहा है। प्रेमा और उनकी मां द्वारा प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी तथा गृह मंत्री अमित शाह से न्याय की गुहार लगाते हुए जारी किया गया वीडियो खेलपथ के पास है। वीडियो में आर्थिक कठिनाइयों, पिता के न होने से पैदा हुई मुश्किलों और वर्षों के संघर्ष का दर्द सामने आता है। प्रेमा चयन को लेकर भी सवाल उठाती हैं। यहां भावनाओं से आगे बढ़कर तथ्यों की जरूरत है।
यदि प्रेमा की रैंकिंग बेहतर थी और उन्होंने निर्धारित चयन मानकों को पूरा किया था, तो उन्हें टीम में स्थान क्यों नहीं मिला? यदि चयन के लिए कोई अन्य तकनीकी, वर्गीकरण, पात्रता या प्रशासनिक मानदंड लागू था, तो उसे स्पष्ट किया जाना चाहिए। खिलाड़ी को यह जानने का पूरा अधिकार है कि उसका मूल्यांकन किन आधारों पर हुआ।
खेलपथ किसी व्यक्ति या संस्था को बिना पूरी जानकारी के दोषी ठहराने के पक्ष में नहीं है। प्रेमा द्वारा व्यक्त की गई पक्षपात की आशंका को भी अंतिम सत्य मान लेना उचित नहीं होगा। लेकिन उतना ही अनुचित यह भी होगा कि एक अंतरराष्ट्रीय खिलाड़ी द्वारा उठाए गए सवालों को अनदेखा कर दिया जाए। चयन प्रक्रिया की विश्वसनीयता का सबसे बड़ा प्रमाण यही है कि चयनित खिलाड़ी के साथ-साथ बाहर रह गया खिलाड़ी भी यह महसूस करे कि उसके साथ न्याय हुआ है।
पैरा खिलाड़ियों का संघर्ष कई स्तरों पर होता है। प्रशिक्षण, प्रतियोगिताएं, यात्राएं और सीमित संसाधनों के बीच अपने खेल को लगातार ऊंचा उठाना आसान नहीं होता। प्रेमा जैसी खिलाड़ी जब अंतरराष्ट्रीय स्तर तक पहुंचती हैं तो उसके पीछे केवल उनकी प्रतिभा नहीं, बल्कि परिवार का त्याग और संघर्ष भी होता है। इसीलिए प्रेमा और उनकी मां की आवाज को केवल एक शिकायत मानकर आगे बढ़ जाना उचित नहीं होगा।
सवाल बहुत सरल हैं-
चयन के मानदंड क्या थे? प्रेमा की रैंकिंग और हालिया प्रदर्शन का मूल्यांकन कैसे हुआ? उनके चयन में कौन-से तकनीकी या प्रशासनिक मानदंड लागू हुए? और यदि वह पात्र नहीं थीं, तो उन्हें स्पष्ट कारण क्या बताया गया? इन सवालों के जवाब किसी के पक्ष या विपक्ष में फैसला सुनाने के लिए नहीं, बल्कि खेल व्यवस्था में विश्वास कायम करने के लिए जरूरी हैं। आज प्रेमा अपनी बात देश के शीर्ष नेतृत्व तक पहुंचाने के लिए वीडियो के माध्यम से न्याय की गुहार लगा रही हैं। यह स्थिति अपने आप में सोचने को मजबूर करती है- क्या किसी खिलाड़ी को चयन से जुड़ा अपना पक्ष रखने के लिए इतनी दूर तक जाना पड़े? इस प्रश्न का उत्तर प्रेमा को नहीं, हमारी खेल व्यवस्था को देना होगा।
एक बेटी की गरीबी उसका अपराध नहीं हो सकती
प्रेमा की आर्थिक कठिनाइयां उनकी कमजोरी नहीं, उनके संघर्ष की कहानी हैं। खेल प्रतिभा का मूल्यांकन खिलाड़ी की मेहनत, प्रदर्शन और निर्धारित मानकों से होना चाहिए- उसकी आर्थिक स्थिति से नहीं। यदि चयन नियम-सम्मत है तो नियम और निर्णय का आधार सामने आए। यदि कहीं त्रुटि हुई है तो उसे स्वीकार कर सुधारा जाए और यदि खिलाड़ी की शिकायत में तथ्य हैं तो न्याय होना चाहिए।
खेलपथ की मांग किसी को टीम में जबरन शामिल करने की नहीं है। खेलपथ की मांग केवल इतनी है कि प्रेमा विश्वास के मामले की निष्पक्ष समीक्षा हो, चयन के आधार स्पष्ट किए जाएं और खिलाड़ी को संतोषजनक जवाब मिले। क्योंकि खिलाड़ी केवल पदक नहीं होता। वह देश की उम्मीद होता है और जब किसी उम्मीद को यह महसूस होने लगे कि उसकी मेहनत का निष्पक्ष मूल्यांकन नहीं हुआ, तब खेल व्यवस्था की संवेदनशीलता की परीक्षा शुरू होती है।
प्रेमा विश्वास को टीम में जगह मिले या न मिले- इसका फैसला नियम और प्रदर्शन के आधार पर होना चाहिए। लेकिन एक सवाल का जवाब जरूर मिलना चाहिए- “क्या अभावों में पली एक बेटी को अपने सपने के साथ-साथ अपने हक के लिए भी संघर्ष करना पड़ेगा?” इस सवाल का जवाब केवल प्रेमा नहीं, पूरी खेल व्यवस्था को देना है।
